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लेबनान के बेरूत में हुए धमाकों से लोगों की मानसिक स्थिति पर पड़ा गहरा साइड इफेक्ट

Janprahar Desk
25 Aug 2020 3:02 PM GMT
लेबनान के बेरूत में हुए धमाकों से लोगों की मानसिक स्थिति पर पड़ा गहरा साइड इफेक्ट
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लेबनान के बेरूत में हुए धमाकों से लोगों की मानसिक स्थिति पर पड़ा गहरा साइड इफेक्ट
दो हफ़्ते पहले लेबनान के बेरूत में कुछ धमाके हुए थे। जिनसे लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो चुका था ।लोग सड़कों पर आ पहुंचे थे। कई लोगों ने अपने सगे संबंधियों को खो दिया था ।और बड़ी-बड़ी इमारतें मलबे के ढेर में बदल गई। इस हादसे से उबर पाना लोगों के लिए बहुत ही मुश्किल वाला काम साबित हो रहा है और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एक सर्वे के दौरान यह सामने आया है कि बेरूत में हुए धमाकों के साइड इफेक्ट्स लोगों की मानसिक स्थिति पर होते नजर आ रहे हैं।

वहां के लोग थोड़ी सी हलचल होते ही चौक जाते हैं या कोई सामान उठाते वक्त जरा सी आवाज सुनते ही उनके हाथों से समान गिर जाता है ।18 वर्ष के लोग हो या 24 वर्ष के लोग हो ,ये लोग कुछ ऐसी स्थिति में है कि इनके लिए इस हादसे के सदमे से बाहर आना मुश्किल हो रहा है।

धमाकों से मानसिक स्थिति एकदम उथल-पुथल हो चुकी है ,लेकिन वहां रहने वाली सैंन्डा किसी पेशेवर साइकैटरिस्ट की मदद लेने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं है। उनका कहना है कि अब उन्हें इस चीज की आदत हो चुकी है और समस्याओं से निपटने के लिए वे किसी की मदद नहीं लेना चाहती हैं उनका कहना है कि अब वे समस्याओं से निपटना सीख चुके हैं और अपनी बिगड़ती मानसिक स्थिति पर कोई ध्यान ना देते हुए इस धमाके से पहले भी यह लोग गृह युद्ध और सांप्रदायिक संघर्ष जेल चुके हैं ।और उसके बाद कोरोना महामारी से बर्बाद हुई अर्थव्यवस्था ने यहां के लोगों को बिल्कुल तोड़ के रख दिया है।

यहां के मनोज चिकित्सकों का कहना है कि इस घटना के बाद बच्चों को समझाना मुश्किल साबित हो रहा है क्योंकि अब बच्चों को भी आदत हो चुकी है ऐसे हालात देखने की, तो अब वे ऐसी बड़ी घटनाओं को भी खेल के रूप में देखते हैं। मनो चिकित्सकों ने भी इलाज करने के लिए मना कर दिया है क्योंकि उनका कहना है कि वह खुद अभी सदमे में है। उनका कहना है कि टीवी और सोशल मीडिया पर धमाकों से जुड़ी तस्वीरों को बार-बार दिखाए जाने का भी बुरा असर दिमाग पर पड़ता है। मेंटल हेल्थ एनजीओ एंब्रेस से जुड़े जिंद दौ के मुताबिक लोग हताश हो चुके हैं ।जैसे ही उन्हें लगता है कि अब कुछ नहीं होगा तभी कुछ और बुरा घट जाता है।

माता-पिता इतने डर चुके हैं कि वे धमाको को लेकर बच्चों से अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं ।और दूसरी तरफ बच्चे भी इतना डर चुके हैं, तो माता-पिता उन्हें धमाकों का सच बताने से डरते हैं। उन्हें डर है कि बच्चों पर कहीं बुरा प्रभाव ना पड़ जाए।

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