धर्म

क्यों हुई थी सूर्पणखा और श्री कृष्ण की शादी ?

Janprahar Desk
6 July 2020 11:21 PM GMT
क्यों हुई थी सूर्पणखा और श्री कृष्ण की शादी ?
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जन्म से ही शूर्पणखा की छवि राक्षसी कामी और निर्मलता से नरसंहार करने के कारण उसको हमेशा घृणा की दृष्टि से देखा गया है। करोड़ों जन्मों तक तपस्या करने के बाद ऋषि-मुनियों को भी भगवान के दर्शन नहीं हो पाते।

परंतु इसने उनके दर्शन के साथ साथ बातें भी की तथा श्री राम ने उनकी लक्ष्मण के साथ भी बात करवा कर सकती भक्ति रूपी  आदिशक्ति जगत जननी माता सीता के भी दर्शन करवाएं एक जिज्ञासा बनी रहती है कि आखिर शूर्पणखा ने ऐसे कौन से काम किए थे जिसके फलस्वरूप उसे भगवान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ  मनुष्य तथा ज्ञानी जन  हमेशा उसका चिंतन किया करते हैं तो आइए सूर्पणखा के  पूर्व जन्म का वृतांत जानते हैं।

सूर्पणखा पूर्व जन्म में सूपनखा इंद्र की नयनतारा नामक अप्सरा थी उर्वशी रंभा मेनका आदि प्रमुख अफसरों में से इसकी गिनती थी एक बार इंद्र के दरबार में अप्सराओं का नृत्य चल रहा था उस समय नयनतारा नृत्य करते समय भू संचालन अर्थात आंखों से इशारा भी कर रही थी जिसे देख इंद्र विचलित हो गए और उसके ऊपर प्रसन्न हो गए। तब से नयनतारा इंद्र की प्रियसी बन गयी तत्कालीन समय में पृथ्वी पर बर्जा नामक एक ऋषि तपस्या कर रहे थे तब नयनतारा पर प्रसन्न होने के कारण ऋषि की तपस्या भंग करने हेतु इंद्र ने इसे ही पृथ्वी पर भेजा परंतु ऋषि की तपस्या भंग होने पर उन्होंने इसे राक्षसी होने का शाप दे दिया। ऋषि से क्षमा याचना करने पर ऋषि ने उससे कहा कि राक्षसी रूप में ही तुझे भगवान के दर्शन होंगे। तब उसी अप्सरा ने देह त्याग के बाद  सूर्पणखा के रूप में जन्म लिया था।

उसने दृंढ निश्चय कर लिया था कि प्रभु के दर्शन होने पर वह उन्हें प्राप्त कर लेगी वही नयनतारा वाला मोहक रूप बनाकर नयनतारा श्री राम प्रभु के पास गई परंतु एक गलती कर बैठी है कि वह भगवान श्रीराम को पति रूप में प्राप्त करने की इच्छा जाहिर कर बैठी परम् ब्रह्म को प्राप्त करने की प्रक्रिया होती है भक्ति या वैराग्य से ही परमब्रह्म को प्राप्त किया जा सकता है सूर्पणखा भक्ति रूपी सीता और वैरागी लक्ष्मण के पास ना जाकर सीधे परमब्रह्म के पास पहुंच गई और यही उसकी सबसे बड़ी गलती थी। वह तो सीधा श्री राम की पत्नी बनकर भक्ति को ही अलग कर देना चाहती थी। इसके अलावा वैराग्य का भी आश्रय लेती तो प्रभु को प्राप्त कर ली थी परंतु वैराग्य को भी न लेकर अर्थात वैराग्य रूपी लक्ष्मण के पास भी न जाकर एवं अहंकार में आकर सीधे प्रभु के पास चली गई उसमें अहंकार आ गया था। वह  कहती है संपूर्ण संसार में मेरे समान कोई नारी नहीं है इसका अर्थ यह हुआ कि संसार में मेरे समान आपकी पत्नी बनने योग्य कोई भी नारी नहीं है।

अहंकारी को प्रभु मिलना बिल्कुल संभव नहीं है फिर भी उसको उचित ज्ञान प्राप्त करने के लिए वैराग  रूपी लक्ष्मण के पास भेजा गया ताकि उसे प्रभु मिलन की सही प्रक्रिया ज्ञात कर सकें वैरागी लक्ष्मण ने सोचा कि राक्षसी को वैराग्य तो आ नहीं सकता अतः उसे पुनः प्रभु के पास भेज दिया तब प्रभु ने उससे कहा मैं तो भक्त के बस में हूं तब सूर्पणखा भक्ति रूपी सीता माता के पास गई। उसने सोचा की प्रभु इस भक्त के बस में है तो मैं इस भक्त को ही खा जाऊं।अतः  लक्ष्मण जी ने क्रोध में आकर उनकी नाक काट कर अंग भंग कर दिया।

तब सूर्पनखा के ज्ञान चक्षु खुल गए और प्रभु के कार्य को पूरा करने के लिए उनकी सहायक बन गई प्रभु के हाथ से खर दूषण रावण कुंभकरण मेघनाथ आदि निशाचरो को मरवा कर प्रभु प्राप्ति की उचित प्रक्रिया अपनाने के लिए पुष्कर चली गई और जल में खड़े होकर भगवान शिव का ध्यान करने लगी।

10000 वर्ष बाद भगवान शिव ने सूर्पनखा को दर्शन दिए और उसे वरदान दिया कि 28 वे द्वापर युग में श्री राम कृष्ण अवतार लेंगे तब कुव्जा  रूप में तुम्हें भगवान श्री कृष्ण की प्राप्ति होगी  तब श्रीकृष्ण तुम्हारा कुंवर ठीक करेंगे और वहीं नयनतारा अप्सरा मोहक रूप  प्रदान करेंगे तो दोस्तों यह थी वह जिसके अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने किया था सूर्पणखा से विवाह।

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