धर्म

क्यो भगवान् विष्णु की पूजा तुलसी के बिना मानी जाती है अधूरी ?

Janprahar Desk
27 Jun 2020 8:34 PM GMT
क्यो भगवान् विष्णु की पूजा तुलसी के बिना मानी जाती है अधूरी ?
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दोस्तों आपने अक्सर देखा  होगा की हम जब कभी भी  किसी भगवन की पूजा करते है और खासतौर से जब भी भगवान विष्णु की  पूजा करते है चाहे वो उनके किसी भी अवतार की पूजा हो। तो हम  पूजा में तुलसी अवश्य ही रखते है और कहा जाता है की बिना तुलसी के पूजा अधूरी मानी  जाती है।

लेकिन क्या आप जानते है की आखिर ऐसा क्यों कहा जाता है आज अपने इस आर्टिकल से मैं आपको इस के पीछे का कारन बताउंगी। तो आइये चलिए जानते है। 

एक बार भगवान शिव ने अपने तेज  को समुद्र में फेंक दिया था जिससे जालंधर की उत्पत्ति हुई। कहा जाता है कि जालंधर के अंदर अद्भुत शक्तियां थी और उसकी शक्तियों का कारण उसकी पतिव्रता पत्नी वृंदा थी। वृंदा की पतिव्रता धर्म के कारण ही सभी देवी देवता मिलकर भी जालंधर को पराजित नहीं कर पा रहे थे और इस प्रकार जालंधर को अपने शक्तिशाली होने का अभिमान हो गया और वह वृंदा के पतिव्रता धर्म की अवहेलना करने लगा।

जालंधर ने खुद को सर्व शक्तिमान साबित करने के लिए सब से पहले इंद्र को परास्त किया। इसके बाद जालंधर ने भगवान विष्णु को परास्त कर देवी लक्ष्मी को उनसे छीन  लेने की योजना बनाई इस कारण उसने बैकुंठ पर आक्रमण कर दिया। लेकिन देवी लक्ष्मी ने जालंधर से कहा कि हम दोनों का जन्म जल  से हुआ है तो इसलिए हम दोनों भाई बहन हैं उनकी बातों से जालंधर प्रभावित हुआ और वहां से चला गया।

जालंधर को यह पता था कि ब्रह्मांड में अगर कोई सबसे शक्तिशाली है तो वह है देवों के देव महादेव और इसलिए उसने कैलाश पर आक्रमण करने की योजना बनाई तब महादेव को उस से युद्ध करना पड़ा परंतु उसकी पत्नी वृंदा के तप  के कारण भगवान शिव का हर

 प्रहार जालंधर पर निष्फल होता गया और उसने उस युद्ध में एक माया से उसने भगवान सहित सभी देवताओं को भ्रमित कर दिया और वह स्वयं महादेव के रूप में कैलाश पहुंच गया परंतु माता पार्वती उसे देखते ही समझ गई कि वह जालंधर है जो महादेव के रूप में आया है। इससे वह बहुत क्रोधित हुई और उसे मारने के लिए अपना अस्त्र उठा लिया जालंधर को पता था कि माता पार्वती शक्ति की देवी दुर्गा का ही एक रूप है और वह उन्हें इस वक्त पराजित नहीं कर सकता है इसलिए वह वहां से भाग गया। फिर देवी पार्वती ने भगवान विष्णु को जब इस घटना का वर्णन किया तब भगवान विष्णु ने देवी पार्वती को बताया कि जालंधर कि इस  अकल्पनीय शक्ति का कारण उसकी पतिव्रता पत्नी वृंदा है जो जालंधर युद्ध से पहले तप  करती है जिस से जालंधर को यह अद्भुत शक्ति प्राप्त होती है।

अंत में भगवान विष्णु ने योजना बनाई और जालंधर का वेश धारण करके वह वृंदा के पास पहुंच गए। वृंदा भगवान विष्णु को अपना पति समझ कर उनके साथ पत्नी के समान व्यवहार करने लगे इससे वृंदा का तप टूट गया और भगवान शिव ने जालंधर का वध कर दिया। तब देवी वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि एक दिन वह भी अपनी पत्नी से ऐसे ही बिछड़ जाएंगे और इसी कारण भगवान विष्णु राम अवतार में रावण द्वारा सीता हरण के कारण माता सीता  से बिछड़ गए थे।

भगवान विष्णु द्वारा तप  को भंग किए जाने पर देवी वृंदा ने आत्मदाह कर लिया तब उस रॉक  के ऊपर तुलसी का पौधा जन्मा तुलसी का पौधा देवी वृंदा का ही स्वरूप है और तब से ही भगवान विष्णु की पूजा तुलसी जी के बिना अधूरी मानी जाती है।

 तो दोस्तों अब इस आर्टिकल की मदद से आप समझ गए होंगे की आखिर क्यों तुलसी जी के बिना भगवान् विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है और क्यों हमेशा ऐसा कहा जाता है की भगवान् विष्णु  करते समय तुलसी जी का होना आवशयक है।

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