धर्म

क्यों खाटू श्याम को माना जाता है भगवान कृष्ण का रूप ?

Janprahar Desk
4 July 2020 7:27 PM GMT
क्यों खाटू श्याम को माना जाता है भगवान कृष्ण का रूप ?
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हारे का सहारा लखदातार खाटू श्याम जी नीले घोड़े पर सवार मोरवी नंदन खाटू नरेश और शीश का दानी जितने निराले बाबा श्याम के नाम और भक्त हैं उतना ही रोचक इनका इतिहास है।

आज हम जानेंगे कि आखिर क्यों हो राजस्थान में सीकर जिले के एक गांव खाटू के नरेश खाटू श्याम जी को पूरी दुनिया में शीश के दानी के नाम से भी क्यों जाना जाता है कौन है खाटू श्याम जी और कैसे बने बाबा श्याम इन सब के पीछे कौन सी पौराणिक कथा है ?तो चलिए जानते है

 कौरव  वंश के राजा दुर्योधन ने निर्दोष पांडवों को सताने और उन्हें मारने के लिए लाक्षागृह का निर्माण किया था पर सौभाग्य वर्ष वह उस में से बच निकले और वनवास में रहने लगे। एक बार जब वह वन  में सो रहे थे तो उसी स्थान के पास ही एक हिड्म नाम का राक्षस अपनी बहन हिडम्बी के साथ रहता था तब उनको मनुष्य यानी पांडवों की गंध आई  तो उन्हें देखकर ये रक्षास अपनी बहन से बोला कि इन मनुष्यो  को मारकर मेरे पास ले आओ अपने भाई का आदेश पाकर वह वहा आयी जहा  पास ही सभी भाई द्रोपदी सहित सो रहे थे और भीम उनकी रक्षा में जाग रहा था।

भीम के स्वरूप को देखकर हिडम्बी उसपर मोहित हो गई और मन ही मन सोचने लगी कि मेरे लिए उपयुक्त पति यही हो सकता है उसने भाई की परवाह किए बिना भीम को पति मान लिया और कुछ देर बाद हिडम्बी के वापस न लौटने पर हिड्म्बासुर वह आया और स्त्री के सुंदर वेश में अपनी बहन को भीम से बातें करते देख कर बहुत

क्रोधित हुआ।

उसके बाद हिडम्बी  के अनुनय विनय से माता कुंती युधिष्ठिर के निर्णय से दोनों का गंधर्व विवाह हुआ। उपरोक्त अवधि के अंतर्गत हिडम्बी  गर्भवती हुई और एक महा बलवान पुत्र  को जन्म दिया। बाल रहित होने से बालक का नाम घटोत्कच रखा गया। हिडम्बा  ने कहा कि मेरा भीम के साथ रहने का समय समाप्त हो गया है और आवश्यकता होने पर उन्हें मिलने के लिए कह कर वह अपने अभीष्ट स्थान पर चली गई और साथ ही घटोत्कच भी सभी को प्रणाम करके आज्ञा लेकर उत्तर दिशा की ओर चला गया हुआ श्रीकृष्ण के कहने पर मणिपुर में मुरटोतय की लड़की काम कंठिका से गंधर्व विवाह हुआ।  कुछ समय बीतने के बाद उन्हें महान पराक्रमी पुत्र को जन्म दिया जिसकी बहुत ही सुंदर केशो को देखकर का नाम बर्बरीक रखा गया। बल की  प्राप्ति के लिए उसने देवियों की निरंतर आराधना करके उसने  तीनों लोकों में किसी में भी उसके जैसा बल ना हो ऐसा दुर्लभ अतुल बल का वरदान पाया। देवियों ने बर्बरीक ने कुछ समय वही निवास करने के लिए कहा और कहा कि एक विजय नामक ब्राह्मण आएंगे उनके संग में तुम्हारा और अधिक कल्याण होगा आज्ञा अनुसार बरबरी रहने लगे।

तब मगध देश के विजय नमक ब्रह्मण वहा आये और सात शिवलिंग की पूजा की साथ ही विद्या की सफलता के लिए देवियो की पूजा की। ब्राह्मण को स्वप्न में आकर कहा कि सिद्ध माता के सामने आंगन में साधना करो बर्बरीक तुम्हारी सहायता करेगा। ब्रह्मण का आदेश पाकर बर्बरीक ने साधना में विघ्न डालने वाले सभी राक्षसों को यमलोक भेज दिया। उन असुरो  को मारने पर नागो  के राजा वासुकी वहां आए और बर्बरीक को वर मांगने के लिए कहा तब बर्बरीक ने विजय की विधि तपस्या सफल हो यही वर मांगा। ब्राह्मण की तपस्या सफल होने पर उसने बर्बरीक का युद्ध में विजई होने का वरदान दिया उसके बाद विजय को देवताओं ने सुधही प्रदान किया तब से उनका नाम शुद्ध सेन पड़ गया।

कुछ काल बीत जाने के बाद कुरुक्षेत्र मैदान में कौरवों और पांडवों के बीच में युद्ध की तैयारियां होने लगी। इस अवसर पर बर्बरीक भी अपने तेज नीले घोड़े पर सवार होकर आ रहे थे। तब रास्ते में ही भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक की परीक्षा लेने के लिए ब्रह्मण के वेश में उसके पास पहुंचे भगवान ने बर्बरीक की मन की बात जानने के लिए उससे पूछा कि तुम किस की ओर से युद्ध लड़ने आए हो तब बर्बरीक ने कहा कि जो कमजोर पक्ष होगा उसकी ओर से युद्ध मैं लडूंगा। भगवान ने बर्बरीक से कहा कि तुम 3 बाणों से सारी सेना को कैसे नष्ट कर सकते हो तब बर्बरीक ने कहा कि सामने वाले पीपल के पेड़ के सभी पत्ते  एक बार सही निशाने हो जाए और दूसरा उसे भेद देगा। श्री कृष्ण ने मुट्ठी में पेड़ के नीचे दो पत्ते छिपा लिए पर देखते ही देखते एक बाण से क्षण भर में सब पत्ते भेद  गए तब श्री कृष्ण ने देखा वास्तव में यह एक बार में सब को यमलोक भेज सकता है।

तो ब्राह्मण बने भगवान कृष्ण ने बर्बरीक से याचना की तो बर्बरीक ने कहा कि ब्राह्मण क्या चाहते हो तो भगवान कृष्ण ने कहा कि क्या सबूत है कि जो मैं मांगूंगा वह मुझे मिल जाएगा।

तब बर्बरीक ने कहा कि जब वचन की बात की है तो तुम प्राण भी मांगोगे तो मिल जाएंगे तो ब्राह्मण के वेश  में नटवर बोले मुझे तुम्हारा शीश का दान चाहिए यह सुनकर बर्बरीक स्तब्ध रह गए और बोले अपना वचन पूरा करूंगा लेकिन सच कहो आप कौन हो तब भगवान नटवर ने अपना  विराट स्वरूप बताते हुए कहा कि यदि तुम युद्ध में भाग लोगे तो दोनों कुल पूर्णतया नष्ट हो जायेंगे।

तब बर्बरीक ने कहा कि आप मेरा शीश का दान तो ले लीजिये पर मेरी एक इच्छा है कि मैं युद्ध को आखिर तक देख सकूं तो भगवान ने कहा कि तुम्हारी इच्छा जरूर पूरी होगी तब बर्बरीक ने अपना सिर धड़ से काट कर दे दिया।

उसके बाद भगवान ने बर्बरीक के शीश को अमृत जडियो के  सहारे वह पहाड़ के उच्चे शिखर पर उगे  एक पीपल के पेड़ पर स्थापित कर दिया। 18 दिन तक चले युद्ध में पांडवो को विजय प्राप्त हुई थी उन्हें साथ ही उन्हें अपनी जीत पर घमंड हो गया तब श्री कृष्ण उन सबको लेकर वहां पहुंचे जहां पर बर्बरीक का सिर स्थापित था पांचो भाई बर्बरीक के सामने अपनी अपनी वीरता का बखान करने लग गए। तब बर्बरीक के सिर ने कहा कि आप सब का घमंड करना व्यर्थ है क्योंकि कि मुझे तो इस पुरे युद्ध में श्री कृष्ण का सुदर्शन चक्र ही चलता नजर आया था।

इसके बाद बर्बरीक चुप हो गए और आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी तब भगवान कृष्ण ने प्रसन्न होकर बर्बरीक को वरदान दिया कि कलयुग में तुम मेरे श्याम नाम से पूजा जाओगे और तुम्हारे स्मरण मात्र से ही सभी मनोरथ पूर्ण होंगे।

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