धर्म

इस वृक्ष को माना जाता है भगवान् विष्णु का रूप।

Janprahar Desk
2 July 2020 9:42 PM GMT
इस वृक्ष को माना जाता है भगवान् विष्णु का रूप।
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गर्मी के दिनों में सुर्ख लाल रंग की पकड़ टपके हुए गूलर के फल की महक सब को अपनी ओर आकर्षित करती हैं इन फलों को जब दो टुकड़ों में चीरा जाता है तो उसमें से कई छोटे-छोटे मच्छर जैसे कीड़े उड़ भागते हैं खेल खेल में ही सही इन कीड़ों को उनके प्राकृतिक ऐसी रिहाई कराने में बड़ा मजा आता है।  उस समय हम सभी के मन में विचार अवश्य आता है कि इन फलों में कहीं कोई छेद नहीं कहीं से कटा नहीं फटा नहीं तो आखिर इसमें इतने सारे कीड़े घुस कैसे गए तो आइए आज हम गूलर के फल में उपस्थित पौराणिक कारण जानते है।

प्राचीन काल में प्रह्लाद के पिता असुर राज हिरण कश्यप थे जिनको देवता मनुष्य असुर पशु अस्त्र-शस्त्र तथा  दिन और रात किसी से कभी भी न मरने का वरदान का तथा अपनी  इसी वरदान  के चलते वह अपने आप को भगवान समझने लगा  तथा अपनी पूजा करवाने लगा असुर राज  हिरण्यकश्यप का शासन बहुत कठोर था देवता दानव सब उसकी चरण वंदना करते थे।  वे विष्णु भक्तों को कठोर दंड देता  था उसका अत्याचार दिनों दिन बढ़ता जा रहा था उसके शासन से सब लोग और लोकपाल घबरा गए तथा सभी ने नारायण की शरण ली देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर नारायण ने असुर राज के वध का आश्वासन दिया।

इधर अहंकारी दैत्य राज के घर में उसका स्वयं का  बेटा प्रहलाद जो कि बचपन से ही नारायण भक्त था उसने अपने पिता को कभी भी भगवान नहीं। प्रहलाद अन्य असुर बालकों को भी समय-समय पर धर्म का उद्देश्य  देता रहता था हिरण्यकश्यप  प्रह्लाद के  इस आचरण पर बहुत क्रोधित रहता था उसने प्रहलाद को बहुत समझाया लेकिन प्रह्लाद फिर भी नारायण भक्ति करते रहे। जिससे क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने उसे तरह तरह की यातनाय दी जैसे उसको अस्त्र-शस्त्र से काट डालने का प्रयत्न  किया गया उसे पहाड़ से  नीचे खाई में फेंक कर मार डालने का प्रयास किया गया उनको सर्पो  से भरे कोठरी में बंद कर  दिया गया प्रह्लाद को होलिका के साथ चिता में बैठा जलाने का प्रयास किया गया लेकिन यहां भी नारायण की कृपा से होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गए।

सारे उपाय विफल होते देख असुरराज के  क्रोध की कोई सीमा नहीं रही उसने प्रह्लाद को दरबार में बुलाया और डाटते हुए कहां हे मुर्ख बालक तू बड़ा उदंड हो गया है तू  किस के बल पर मेरी आज्ञा के विरुद्ध काम कर रहा है प्रह्लाद ने बड़ी विनम्रता से कहा पिताजी ब्रह्मा से लेकर एक तिनका  तक सब छोटी बड़ी चर अचर जीवो को जिसने अपने बस में कर रखा है मैं उसी परमेश्वर की उसी नारायण की वंदना करता हूं मैं उसी की शरण में हूं। वह परमेश्वर ही अपनी शक्तियों के द्वारा इस विश्व की रचना रक्षा और संघार करता है आप अपना यह अहंकार छोड़कर अपने मन को सब के प्रति उदार बनाइए।

प्रह्लाद की बात सुनकर हिरण्यकश्यप का शरीर क्रोध से थरथर कांपने लगा उसने प्रह्लाद से कहा अरे  मंदबुद्धि यदि तेरा भगवान हर जगह है तो इस खम्भे में दिखाई क्यों नहीं देता है। यह कहकर वह सिंघ्हासन से कूदा  और बड़ी जोर से उसने खम्भे पर गदा से प्रहार किया उसी समय उसके भीतर से नरसिंह भगवान प्रकट हुए उनका आधा शरीर सिंह का और आधा मनुष्य का था। क्षण मात्र में ही नरसिंह भगवान ने असुर राज को अपनी जंघा पर लेते हुए उसके सीने  को अपने नाखूनों से फाड़  दिया और उसकी जीवन लीला समाप्त कर अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा की। पापी दुराचारी असुर राज हिरण्यकश्यप  की खून के कारण भगवान नरसिंह के हाथों में अत्यंत पीड़ा होने लगी उनके हाथों तथा नाखुनो में अत्यंत जलन होने लगा फिर भगवान ने अपने हाथों की जलन को शांत करने के उद्देश्य से और असुर राज के खून से लथपथ अपने हाथों को वहां पर मौजूद गूलर के वृक्ष में अंदर तक ढसा दिया जिससे उनके जलन और पीड़ा का  तुरंत निवारण हो गया।

पापी का खून लगते ही  है गूलर का फल वीरस हो गया तथा उसमे कीड़े उत्पन्न हो गए तभी से गुलर की डाल में उपस्थित कीड़ो  का कारण यही माना जाता है यहां पर आपको एक जानकारी और देते चले असुर राज हिरण्यकश्यप के खून लगे होने के कारण गूलर का पेड़ भी पीड़ा  से विचलित हो गया फिर उसने नारायण से प्रार्थना की कि मुझे किस अपराध के कारण है यह पीड़ा आपने दिया है उससे यह जलन सहन नहीं होता है मैं आपकी शरण में हूं आप कोई उपाय करके मेरी पीड़ा को शांत करिए। तब नारायण ने उसे अपना रूप प्रदान किया और यह वरदान दिया कोई भी मर्त्यलोक का वासी जो तुम्हारी छाया में आएगा तो उसके जीवन की कुछ पूर्ण अंश से तुम्हारी पीड़ा का समन होता रहेगा इसी कारण भगवान विष्णु का एक नाम औदुंबरो भी पड़ा ये गूलर का संस्कृत नाम है।

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