धर्म

ये मंदिर देता है शिव पार्वती के अर्धनारीश्वर अवतार का प्रमाण।

Janprahar Desk
14 July 2020 10:02 PM GMT
ये मंदिर देता है शिव पार्वती के अर्धनारीश्वर अवतार का प्रमाण।
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धार्मिक दृष्टि से पूरे संसार को शिव का रूप माना जाता है क्योंकि शिव को ही सृष्टि का सृजन हार और संघारकर्ता  कहा जाता है इसलिए तो अलग-अलग मंदिरों में भगवान शिव अलग-अलग रूपों में मिलते है।

कहा भी गया है एक ओंकार मतलब ओंकार एक हैं और वो एक भगवान शिव ही है इन सब अवतारों से परे भगवान शिव के अर्धनारीश्वर रूप का भी जिक्र होता है जो आधा भगवान शिव और आधा माता पार्वती का हिस्सा माना जाता है अब तक आपने भगवान्  शिव के अर्धनारीश्वर अवतार के बारे में किस्से कहानियों में सुना होगा।

लेकिन इसका जीता जगता और विश्व का एक मात्र प्रमाण कांगड़ा जिला में मिलता है जहां भगवान शिव और माता पार्वती एक साथ पाषाण रूप में विराजमान है और माना यह भी जाता है कि यह शिवलिंग ब्रह्मांड का पहला शिवलिंग है।

देवी देवताओं की धरती के साथ पहाड़ों की गोद में बसा हिमाचल रहस्यों का भी स्वामी है इंसान को उलझाने वाली दुनिया से जुड़ी यहाँ कही ऐसी कहानी मिल जाएगी  जो आज तक रहस्य बनी हुई है।

हम बात कर रहे हैं कांगड़ा जिला के रहस्य्मयी काठगढ़ महादेव मंदिर के बारे में जो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। काठगढ़ मंदिर में रहस्य की बात यहां शिव पार्वती का एक साथ विराजमान होना है जो दोनों का अर्धनारीश्वर अवतार माना जाता है। मंदिर में स्थित शिव लिंग की लंबाई 7 से 8 फीट है जबकि माता पार्वती की पांच से छह फीट दोनों काले भूरे पाषाण में विराजमान है। चौंकाने वाली बात यह है कि शिव पार्वती के रूप में विराजमान इन पाषणो के बीच का हिस्सा नक्षत्रों के अनुरूप घटता बढ़ता रहता है दोनों एक दूसरे से अलग रहते हैं और शिवरात्रि के दिन ही दोनों का आपस में मिलन होता है।

काठगढ़ महादेव मंदिर का इतिहास कई दंत कथाओं औरकिवदंतियो से जुड़ा हुआ है मंदिर में विराजमान शिव पार्वती के बारे कई किस्से कहानियां प्रचलित हैं लेकिन शिवपुराण में वर्णित कथा के अनुसार एक समय में ब्रह्मा और विष्णु के बीच अपने बड़प्पन को लेकर युद्ध हो रहा था। शिव आकाश मंडल से यह सब देख रहे थे दोनों देवता एक दूसरे के वध की इच्छा से अलग-अलग अस्त्रों का प्रयोग कर रहे थे दोनों देवों के इन कोशिशों से सृष्टि को भारी नुकसान हो सकता था लिहाजा उन्हें रोकने के लिए खुद भोलेनाथ महाअग्नि तुल्य स्तम्भ के रूप में ब्रह्मा और विष्णु के बीच प्रकट हो गए जिससे दोनों देवताओं के अस्त्र अपने आप शांत हो गए और युद्ध भी शांत हो गया इसके बाद शिव का यही अतुल्य स्तम्भ  काठगढ़ महादेव के रूप में जाता है कहा जाता है की इस मंदिर में महाराजा रणजीत सिंह के कार्यकाल में सबसे ज्यादा प्रसिद्धि प्राप्त की महाराजा ने जब गद्दी संभाली तो पूरे राज्य के धार्मिक स्थलों का भ्रमण किया जब वो काठगढ़ पहुंचे तो आनंदित होकर उन्होंने शिवलिंग पर सुन्दर मंदिर का निर्माण करवाया और शिवलिंग की महिमा का गुणगान भी चारो और करवाया।

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