धर्म

सुख सम्पत्ति प्रदान करता है ये एक व्रत।

Janprahar Desk
1 July 2020 9:57 PM GMT
सुख सम्पत्ति प्रदान करता है ये एक व्रत।
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आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी अर्थात पद्मा एकादशी मनाई जाती है इस दिन बहुत से लोग व्रत भी रखते है लेकिन क्या आप इसके पीछे जुडी कहानी  जानते है अगर नहीं तो आज मैं आपको अपने  आर्टिकल के माध्यम से बताउंगी की इस व्रत के पीछे क्या कथा है ?

धर्मराज युधिष्ठिरने एक बार  भगवान कृष्ण से पूछा की आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और उस दिन कौन से देवता की पूजा होती है तथा उसकी विधि क्या है विस्तार पूर्वक कहिए ?

भगवान श्रीकृष्ण बोले हे राजन् एक समय देवर्षि नारदजी ने ब्रह्मा से यही प्रश्न पूछा था तब परमपिता ब्रम्हा जी बोले हे नारद तुमने कलयुग के जीवो के उद्धार के लिए सबसे उत्तम प्रश्न किया है क्योंकि एकादशी का व्रत सब व्रतों में श्रेष्ठ है। इस के व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं इस एकादशी का नाम पद्मा है इस के व्रत करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं।

एक पौराणिक कथा के अनुसार सूर्यवंशी मांधाता नाम का एक राजा था वह सत्यवादी महान प्रतापी और चक्रवर्ती था। वह अपनी प्रजा का पुत्र की तरह पालन करता था इसकी समस्त प्रजा धनधान्य से पूर्ण थी और सदैव सुख पूर्वक रहती थी। इसके राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ता था।  एक समय राजा के राज्य में अकाल पड़ गया और प्रजा अन्न की कमी के कारण अत्यंत दुखी रहने लगी।

राज्य में यज्ञ होना बंद हो गए फिर एक दिन प्रजा राजा के पास जाकर प्रार्थना करने लगी कि हे राजन समस्त विश्व की सृष्टि का मुख्य कारण वर्षा है इसी वर्षा के अभाव से राज्य में अकाल पड़ गया है और अकाल से प्रजा मर रही है।

हे राजन आप कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे हम लोगों का दुख दूर हो इस पर राजा  बोला कि आप लोग ठीक कह रहे हैं वर्षा के ना होने से आप लोग बहुत दुखी हैं राजा के पापों के कारण ही प्रजा को दुख भोगना पड़ता है।

मैं बहुत सोच-विचार कर कह रहा हूं फिर भी मुझे अपना कोई दोष नहीं दिखाई देता आप लोगों के दुख को दूर करने के लिए मैं बहुत यत्न कर रहा हूं ऐसा कहकर राजा मांधाता भगवान की पूजा कर कुछ मुख्य व्यक्तियों को साथ लेकर वन को चल दिए। वहां वह ऋषियों के आश्रमों में घूमते घूमते अंत में परमपिता ब्रह्मा के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम पर पहुंचा उस स्थान पर राजा रथ से उतरा और आश्रम में आया वहां मुनि अभी नित्यकर्म से निवृत हुए थे कि राजा ने उनके सम्मुख प्रणाम किया और मुनि ने उन को आशीर्वाद दिया।

 फिर राजा से बोले कि हे राजन आप इस स्थान पर कैसे पधारे हैं तो कहिए राजा बोला कि महर्षि मेरे राज्य में 3 वर्ष से वर्षा नहीं हो रही है इससे अकाल पड़ गया है और प्रजा दुख भोग रही है राजा के पापों के प्रभाव से ही प्रजा को कष्ट मिलता है ऐसा शास्त्रों में लिखा है मैं धर्म अनुसार राज्य करता हूं श्री अकाल कैसे पड़ गया है इसका मुझे अभी तक पता नहीं लग सका अब मैं आपके पास इस संदेह की निर्वति  के लिए आया हूं। आप कृपया करके मेरे इस संदेह को दूर कीजिए और प्रजा के कष्ट को दूर करने के लिए कोई उपाय बतलाइए।

इस पर वह ऋषि बोले हे राजन् यह सतयुग सब युग में श्रेष्ठ है इसमें धर्म के चारों चरण सम्मिलित हैं इस युग में केवल ब्राह्मणों को ही तपस्या करना तथा वेद पढ़ने का अधिकार है। परंतु आपकी राज्य में एक शूद्र भी तपस्या कर रहा है इसी दोष के कारण आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है।  यदि आप प्रजा का भला चाहते हैं तो उस शूद्र को मार दीजिए।

इस पर राजा बोले हे मुनीश्वर मैं उस निरपराध तपस्या करने वाले शूद्र को नहीं मार सकता आप इस दोष से छूटने का कोई अन्य उपाय बताइए। तब ऋषि बोले हे राजन् यदि तुम ऐसा ही चाहते हो तो आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पदमा नाम की एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे राज्य में वर्षा होगी और प्रजा सुख पाएगी। क्योंकि इस एकादशी का व्रत सिद्धियों को देने वाला है और उपद्रव को शांत करने वाला है मुनि के वचनों को सुनकर राजा अपने नगर को वापस आया और विधि पूर्वक पदमा एकादशी व्रत किया उस व्रत के प्रभाव से राज्य में वर्षा हुई और मनुष्यों को सुख पहुंचा इस एकादशी को देव शयनी एकादशी भी कहते हैं इस व्रत के करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं अतः मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्यों को एकादशी का व्रत करना चाहिए। चातुर्मास व्रत भी इसी एकादशी के व्रत से शुरू किया जाता है

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