धर्म

कर्ण के इन सवालो पर श्री कृष्ण भी रह गए थे स्तब्ध।

Janprahar Desk
4 July 2020 7:35 PM GMT
कर्ण के इन सवालो पर श्री कृष्ण भी रह गए थे स्तब्ध।
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महाभारत की कथा बहुत ही अद्भुत और प्रेरणादायक है यह कथा धर्म और अधर्म के बीच हुए युद्ध तक सीमित नहीं है अपितु इसमें कई ऐसे मर्म छिपे है जो मानव जाति के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। ऐसा ही एक गजब का संवाद कर्ण और वासुदेव श्री कृष्ण के बीच हुआ था।  जिसमें कर्ण ने कुछ बेहद ही कटु परन्तु सत्य प्रश्न पूछे थे जो शायद हम सभी के मन में भी कभी न कभी उठे होंगे। तो चलिए एक बार विस्तार से प्रकाश डालते हैं कि श्री कृष्ण ने उन प्रश्नों के उत्तर दिए थे।

कर्ण ने श्री कृष्ण से पूछा की उनकी माता कुंती ने उन्हें जन्म देते ही उनका त्याग कर दिया था। लोक लाज के भय से कुंती ने उन्हें एक नदी में प्रवाहित कर दिया था उस वक्त कुंती ने यह तक  नहीं सोचा कि आगे उस नवजात शिशु का क्या होगा यह भी संभव था कि वह किसी भूखे पशु का निवाला बन जाते हैं और उनकी कथा में ही समाप्त हो सकती थी।

उन्होंने दूसरा प्रश्न पूछा कि वे जन्म से क्षत्रिय थे और गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा लेने की पूर्ण पात्रता भी रखते हैं परंतु फिर भी द्रोणाचार्य ने उन्हें शिक्षा के मौलिक अधिकारों से वंचित रखा इतना ही नहीं है उन्होंने उस बालक को क्षत्रिय मानने तक से इनकार कर दिया क्या इसके  लिए भी वो ही जिम्मेदार थे।

फिर सूर्यपुत्र ने लीलाधर से तीसरा प्रश्न किया उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से एक बार उनसे गौ वध हो गया था उन्होंने भगवान परशुराम के सानिध्य में रहते हुए जब तीर देगा तो गलती से उस तीर के मार्ग में एक गाय आ गई जिसके चलते भगवान परशुराम में उन्हें एक भीषण श्राप दे दिया की जब उन्हें अपनी विद्या की सबसे ज्यादा जरूरत होगी तब वह अपनी विद्या भूल जाएंगे परंतु क्या यह भूल  इतनी बड़ी थी जिसके चलते उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

यह सब सुनकर श्यामसुंदर उन्हें उत्तर देने की वाले थे परंतु अभी भी कर्ण का मन अशांत था और उन्होंने मुरलीधर कृष्ण से अपना चौथा प्रश्न किया उन्होंने कहा कि द्रौपदी ने स्वयंवर की भरी सभा में सबके सामने उन्हें अपमानित किया महज इसीलिए क्योंकि वो किसी कुलीन राजघराने के राजा नहीं थे क्या इसमें भी उन्ही का दोष था क्या इस समाज में केवल कुलीनता  को ही महत्व दिया जाता है क्या इस सभ्य समाज में योग्यता और परिश्रम से अधिक प्रताप का कोई मूल्य नहीं है।

उसके बाद दानवीर कर्ण ने श्रीकृष्ण से अपना अंतिम प्रश्न किया उन्होंने कहा कि यदि उन्हें अपने जीवन में किसी व्यक्ति से सम्मान मिला था तो वह था दुर्योधन। बस इसी ऋण को चुकाने के लिए उन्होंने युद्ध में अपने प्राणो की भीआहुति देदी। लेकिन क्या मित्रता का ऋण चुकाना कोई अपराध है क्या उसकी मदद नहीं की जानी चाहिए जिसने कभी हमारी मदद की थी क्या हम लोगों से सहायता लेकर स्वार्थी हो जाएं। और कभी किसी डूबते का सहारा ना बने और इस प्रकार कर्ण ने अपने जीवन के सभी महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे।

श्री कृष्ण ने कर्ण को उत्तर देते हुए कहा मेरा जन्म कारावास के अंधकार में हुआ जिस रात मेरा जन्म हुआ उसी रात मुझे अपने माता-पिता से अलग होना पड़ा यहां तक कि मेरे पैदा होने से पहले ही मौत मेरा इंतजार कर रही थी जब मैं चल भी नहीं पाता था तब  मेरे ऊपर ही प्राणघातक हमले हुए मेरे मामा ने मुझे अपना सबसे बड़ा शत्रु समझा।

उन्होंने कर्ण से आगे कहा कि तुम्हारा बचपन की रथो की धमक घोड़ों की हिनहिनाहट और तीर कमानो के बीच गुजरा लेकिन मैंने ग्वाला बनकर गायों की सेवा की उन्हें चराया  उनका दूध बोहाया और तो और उनका गोबर भी उठाया। इसके आगे उन्होंने कहा जब तुम अपनी वीरता के लिए गुरुजनों से प्रशंसा पाते थे उस समय मेरे पास कोई गुरु ही नहीं था मेरे पास शिक्षा भी नहीं थी और ना ही कोई गुरुकुल मदद के लिए शक्तिशाली मित्र तो क्या बल्कि  मुझे तो कई बार मां की डांट सुननी पड़ती थी सेना होना तो दूर की बात है मेरे पास तो महल तक नहीं था और ना ही मैं कहीं का राजा था।

हालांकि कई बरसों बाद उज्जैन नगरी में मुझे ऋषि सांदीपनी के आश्रम में जाने का अवसर जरूर मिला परंतु वहां पर सीखी गई कुछ चौपाइयों से मैं महाभारत का युद्ध नहीं लड़ सकता था यहां तक कि कभी मुझे युद्धभूमि से भागना भी पड़ा और संसार ने मुझे रणछोर और कायर तक कहे दिया।  उन्होंने आगे कहा कि तुम्हारी यह बात बिल्कुल सही है की तुमने द्रोपदी का स्वयम्बर नहीं जीता परंतु फिर भी तुमने अपनी पसंद की लड़की से विवाह किया | इसके ठीक विपरीत मेरे जितने भी विवाह हुए वह सभी महज राजनीतिक कारणों से हुए और उनमें वे सभी स्त्रियां सम्मिलित हैं जिन्हें मैंने राक्षसों से चुराया था परंतु मुझे तो उसे ही छोड़ना पड़ा जो मेरी आत्मा में बसती थी और अंततः मेरा प्रेम अधूरा ही रहा। उन्होंने आगे कहा यदि दुर्योधन युद्ध जीत जाता  तो विजय का श्रेय तुम्हें भी मिलता लेकिन धर्मराज युधिष्ठिर की जीत का श्रेय केवल अर्जुन को मिला और कौरवों ने मुझे ही अपनी हार के लिए उत्तरदाई ठहराया है।

 किसी का भी जीवन चुनौतियों से रहित नहीं है सबके जीवन में सब कुछ ठीक नहीं होता है कुछ कमियां दुर्योधन में थी तो कुछ युधिष्ठिर में भी। सत्य  क्या है और उचित क्या है यह हम अपनी आत्मा की आवाज से स्वयं ही निर्धारित करते  हैं इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता हमारे साथ कितनी बार अन्याय होता है कितनी बार हमारा अपमान हुआ यहां तक कि इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कितनी बार हमारे अधिकारों का हनन होता है फर्क तो केवल इस बात से पड़ता है कि हम उन सब का सामना किस प्रकार से करते हैं।

यह दुनिया एक रंगमंच है और यहां पर कोई छोटा या बड़ा नहीं होता है वरन यहां पर हम सभी की अपनी-अपनी भूमिकाएं होती है और हमें उन्हें निभाना होता है और विकल्प हमारे पास है कि हम अपनी भूमिकाएं निभाते हैं जिस प्रकार से जीवन एक शाश्वत सत्य है ठीक उसी प्रकार से मृत्यु भी अटल सत्य है और एक न एक दिन मुझे भी इसका सामना करना ही होगा परंतु जो मन में आता है वही परमात्मा की शरण में जाता हैऔर उन्हें संसार भी सदैव स्मरण भी रखता है और  तुम भी उन्हीं में से एक हो।

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