धर्म

इस जगह अगस्त के महीने में भगवान् शिव देते है अपने भक्तो को दर्शन।

Janprahar Desk
2 July 2020 8:51 PM GMT
इस जगह अगस्त के महीने में भगवान् शिव देते है अपने भक्तो को दर्शन।
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एक ऐसा तालाब जहा  आज भी वास  करते हैं भगवान विष्णु और इस तालाब में भगवान विष्णु शेषनाग के ऊपर विश्राम करते हुए सबको नजर आते हैं तो चलिए जानते हैं इस खास मंदिर की अनसुनी बातें।

वैसे तो आजकल आपने ऐसे कई मंदिरों के बारे में सुना होगा जिनके बारे में मान्यताएं प्रचलित है कि वहां साक्षात भगवान वास करते हैं लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि भगवान का बसेरा किसी तालाब आदि में भी हो सकता है। ये तो सब जानते ही हैं कि भगवान विष्णु का निवासी  शीर सागर में है और यह शेषनाग पर निवास करते हैं। लेकिन कलयुग में भी भगवान आज एक तालाब में निवास करती हैं इस बात पर शायद ही किसी को यकीन होगा।

तो आइये दोस्तों इस आर्टिकल की मदद से जानते है इस खास तालाब के बारे में जहां वास करते हैं श्रीहरि।

 भारत देश में तो ऐसे बहुत से मंदिर है जिनकी सुंदरता हमे उनकी तरफ आकर्षित करती है लेकिन आज जब भारत नहीं बल्कि नेपाल के काठमांडू से लगभग 10 किलोमीटर दूर एक मंदिर की बात कर रहे हैं। आपको बता दू की यह मंदिर नेपाल के शिवपुरी में स्थित है जो भगवान विष्णु को समर्पित है इस मंदिर को बूढ़ा नीलकंठ मंदिर के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि यह मंदिर  यहां का सबसे भव्य सुंदर और सबसे बड़ा मंदिर है।  मंदिर में विष्णु जी की सोती  हुई प्रतिमा विराजमान है माना जाता है कि इस मंदिर में विराजमान इस मूर्ति की लंबाई कुल मिलाकर लगभग 5 मीटर है और तालाब  की लंबाई 13 मीटर है यह तालाब ब्राह्मणी समुंदर का प्रतिनिधित्व करता है। इस मूर्ति को देखने पर इसकी भव्यता का एहसास होता है तालाब में स्थित विष्णु जी की मूर्ति शेषनाग की कुंडली में विराजित है। मूर्ति में विष्णु जी के पैर बाहर हो गए हैं और बाकी के 11सिर  उनके सिर से टकराते हुए दिखाई देते हैं।  इस प्रतिभा में विष्णु जी के चार हाथ उनके दिव्य गुणों को दर्शाते हैं बता दें पहला चक्र मन  का प्रतिनिधि करता है अन्य चार तत्व कमल का फूल चलती ब्रह्मांड और गधा  प्रधान ज्ञान को दर्शाता है।

दोस्तों यहां सिर्फ भगवान विष्णु ही नहीं बल्कि भगवान शिव शंकर भी विराजमान है। जहां मंदिर में भगवान विष्णु प्रत्यक्ष मूर्ति के रूप में विराजित है वही भोलेनाथ पानी में अप्रत्यक्ष रूप से विराजित हैं।  माना जाता है कि बूढ़ा नीलकंठ मंदिर का पानी गोसाई कुंड में उत्पन्न हुआ था लोगों का मानना है कि अगस्त में होने वाली वार्षिक शिव उत्सव के दौरान झील के पानी के नीचे शिव की एक छवि देखने को मिलती है।

साथ ही इसके पीछे एक खास पौराणिक गाथा भी है एक पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के समय समुंद्र से विष निकला था तो सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए शिवजी ने विष को अपने कंठ यानी कि गले में ले लिया जिस कारण उनका गला नीला हो गया था इस कारण ही भगवान शिव को नीलकंठ कहा जाने लगा था जब जहर  के कारण उनका गला जलने लगा तो वह काठमांडू के उत्तर की सीमा की ओर गए और झील बनाने के लिए त्रिशूल से एक पहाड़ पर वार किया जिससे इसी झील का निर्माण हुआ कहते हैं और इसी झील के पानी से उन्होंने अपनी प्यास बुझाई। कलयुग में नेपाल की झील को गोसाई कुंड के नाम से जाना जाता है और यह आज भी यहां पर स्थित है।

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