धर्म

आखिर क्यों नहीं सड़ता गंगा जल ?

Janprahar Desk
4 July 2020 7:21 PM GMT
आखिर क्यों नहीं सड़ता गंगा जल ?
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गंगा एक नदी शब्द या  जल की धारा नहीं है बल्कि गंगा भारत की आत्मा है यदि गंगा नहीं होती तो भारत कभी भी आध्यात्मिक क्षेत्र में इतनी उन्नति नहीं कर पाता

गंगा का उद्गम हिमालय से होता है। गंगोत्री को गंगा का उद्गम माना गया है। गंगोत्री उत्तराखंड राज्य में स्थित गंगा का उद्गम स्थल है। सर्वप्रथम गंगा का अवतरण होने के कारण ही यह स्थान गंगोत्री कहलाया, किंतु असल में गंगा का उद्गम कुछ किलोमीटर  और ऊपर श्रीमुख नामक पर्वत से होता है। वहां गोमुख के आकार का एक कुंड है जिसमें से गंगा की धारा फूटी है।इस गोमुख कुंड में पानी हिमालय के और भी ऊंचाई वाले स्थान से आता है।

हिमालय से निकलकर यह नदी प्रारंभ में 3 धाराओं में बंटती है- मंदाकिनी, अलकनंदा और भगीरथी। उत्तराखंड के देवप्रयाग में अलकनंदा और भगीरथी का संगम होने का दृश्य बड़ा विख्यात है  बाद में यह धारा गंगा के रूप में दक्षिण हिमालय से ऋषिकेश के निकट बाहर आती है और हरिद्वार के बाद मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है।

इसके बाद यह नदी उत्तराखंड के बाद उत्तरप्रदेश  होती हुई  बिहार में पहुंचती है और फिर पश्चिम बंगाल के हुगली पहुंचती है। इसके बाद  ब्रह्मपुत्र नदी से मिलकर गंगा समुद्र में समा जाती है इस स्थान को गंगासागर कहा जाता है , बंगाल की खाड़ी तक गंगा अपनी यात्रा में चारो तरफ सुख समृद्धि बाटती रहती है   इस यात्रा में गंगा में कई नदियां जुड़ती  हैं जिसमें प्रमुख हैं- सरयू, यमुना, सोन, रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, बूढ़ी गंडक, कोसी, घुघरी, महानंदा, हुगली, पद्मा, दामोदर, ब्रह्मपुत्र और मेघना।

पौराणिक कथा के अनुसार गंगा नदी को भगीरथ ने स्वर्ग  से धरती पर उतारा था।  गंगा श्रीहरि  के चरणों से निकलकर भगवान शिव की जटाओं  में आकर बसी गई थी।  ब्रह्मा से लगभग 23वीं पीढ़ी बाद और राम से लगभग 14वीं पीढ़ी पूर्व भगीरथ हुए। भगीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था।हिन्दुओ का ऐसा विश्वास है की  गंगा में स्नान करने से उनके  सभी पापों का नाश हो जाता है। प्रत्येक हिन्दू की अंतिम इच्छा होती है कि  मरने के बाद उसकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में ही किया जाए।

लेकिन असंख्य मात्रा में अस्थियों का विसर्जन करने के बाद भी गंगा का जल पवित्र एवं पावन क्यों बना रहता है। इसके पीछे क्या कारन है ये आज मैं आपको अपने इस आर्टिकल आर्टिकल की मदद से बताउंगी।

एक कथा के अनुसार एक दिन देवी गंगा श्रीहरि से मिलने बैकुंठ धाम गई और उन्हें जाकर बोली कि प्रभु! मेरे जल में स्नान करने से सभी के पाप नष्ट हो जाते हैं लेकिन मैं इतने पापों का बोझ कैसे उठाऊंगी? मेरे में जो पाप समाएंगे उन्हें कैसे समाप्त करूंगी? इस पर श्रीहरि बोले कि गंगा! जब साधु, संत, वैष्णव आकर आप में स्नान करेंगे तो आपके सभी पाप घुल जाएंगे।

वैज्ञानिक संभावनाओं के अनुसार गंगाजल में पारा अर्थात मर्करी विद्यमान होता है जिससे हड्डियों में जमा कैल्शियम और फॉस्फोरस पानी में घुल जाता है, जो जल-जंतुओं के लिए एक पौष्टिक आहार है। वैज्ञानिक दृष्टि से हड्डियों में गंधक (सल्फर) विद्यमान होता है, जो पारे के साथ मिलकर पारद का निर्माण करता है, इसके साथ-साथ ये दोनों मिलकर मरकरी सल्फाइड सॉल्ट का निर्माण करते हैं। हड्डि यों में बचा शेष कैल्शियम पानी को स्वच्छ रखने का काम करता है। धार्मिक दृष्टि से पारद शिव का प्रतीक है और गंधक शक्ति का प्रतीक है। सभी जीव अंतत: शिव और शक्ति में ही विलीन हो जाते हैं।

एक बात और जिससे वैज्ञानिक भी हैरान है की हज़ारो श्रद्धालु गंगा का जल शीशी में भरकर लाते  और दशकों तक रखने पर भी वह जल उतना ही निर्मल रहता है जितना  भरते समय होता है आखिर गंगा का जल ख़राब क्यों नहीं होता है इस पर वैज्ञानिकों का यह मत है की गंगा के जल में मौजूद बैक्टीरियोफेज नामक जीवाणु गंगाजल में मौजूद हानिकारक सूक्ष्म जीवों को जीवित नहीं रहने देते अर्थात ये ऐसे जीवाणु हैं, जो गंदगी और बीमारी फैलाने वाले जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं। इसके कारण ही गंगा का जल नहीं सड़ता है।

गंगा जल में प्राणवायु की प्रचुरता बनाए रखने की अदभुत क्षमता है। इस कारण पानी से हैजा और पेचिश जैसी बीमारियों का खतरा बहुत ही कम हो जाता है।

यही कारन है की भारत में गंगा को सिर्फ एक नदी नहीं बल्कि माँ का दर्जा दिया गया है और साथ ही ये तो आप जानते ही है की यदि गंगा को प्रदुषण से दूर रखा जाये तो पूरी दुनिया में इसके जल से साफ़ और कोई जल नहीं है और अब तो ये बात बैज्ञानिक रूप से भी साबित हो गयी है।

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