धर्म

आखिर किसी भी पूजा या अनुष्ठान में कैसे करते है देवतागण भोग ग्रहण ?

Janprahar Desk
11 July 2020 9:16 PM GMT
आखिर किसी भी पूजा या अनुष्ठान में कैसे करते है देवतागण भोग ग्रहण ?
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दोस्तों आप सभी ने भी इस बात को गौर किया होगा कि हिंदू धर्म में कोई भी अनुष्ठान या शुभ कार्य बिना हवन के पूरा नहीं होता है और जब भी हवन होता है उसमें ओम भुर्वः स्वाहा के उच्चारण से आहुति दी जाती है। लेकिन क्या आपको पता है कि हवन के समय हमेशा ओम भुर्वः स्वहा  क्यों बोला जाता है तो दोस्तों आज हम  आपको बताएंगे की हवन में ओम भुर्वः स्वाहा शब्द का क्या महत्व है तो आइए जानते हैं।

हिंदू शास्त्रों के मुताबिक हवन में मंत्र की शुरुआत ओम से होती है क्योंकि इसे सृष्टि का सार  माना जाता है कहते हैं की इस अक्षर में ब्रह्मा विष्णु और महेश तीनों के गुण मिले हुए होते हैं। ओम में तीन अर्थ छुपे हुए हैं जिनमें राज सत और तम शामिल है। हिंदू धर्म सबसे पहले गणेश जी को पूजा जाता है इसलिए माना जाता है कि ओम में भगवान गणेश समाहित है। ओम शब्द में संसार का पूरा रहस्य छुपा हुआ है इसलिए माना जाता है कि इसके उच्चारण से हवन का लाभ सभी को होता है।

ये न  सिर्फ वातावरण को शुद्ध करता है बल्कि मन में भी सकारात्मक भाव जगाता है वही आहुति डालते और हवन के अंत में स्वाहा भी बोला जाता है।

क्योंकि मान्यता है कि देवी देवताओं को अर्पण किया जाने वाला भोग अग्नि के जरिए ही उन तक पहुंचाया जा सकता है। शास्त्र में स्वाहा का अर्थ सही रीती पहुंचाना बताया गया है और दूसरे शब्दों में कहें तो जरूरी पदार्थ को उसके प्रिय तक सुरक्षित पहुंचाना।  श्रीमद्भागवत और शिव पुराण में स्वाहा से संबंधित वर्णन भी है। वास्तव में स्वाहा अग्नि देव की पत्नी है इसलिए हवन में हर मंत्र के साथ उनका उच्चारण होता है। माना जाता है कि देवता प्रसाद तभी ग्रहण करते हैं अग्नि में स्वाहा के माध्यम से अर्पण किया जाए।

पौराणिक  कथाओं के अनुसार स्वाहा दक्ष प्रजापति की पुत्री थी  इनका विवाह अग्नि देव के साथ किया गया था। अग्निदेव अपनी पत्नी स्वाहा के माध्यम से ही हर विषय ग्रहण करते हैं और उन के माध्यम से ही हर विषय आवाहन किए गए देवता को प्राप्त होता है।

स्वाहा  की उत्पत्ति से अन्य रोचक कहानी भी जुड़ी हुई है जिसके अनुसार स्वाहा प्रकृति की ही एक कला थी जिसका विवाह अग्नि के साथ देवताओं के आग्रह पर संपन्न हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं स्वाहा को यह वरदान दिया था कि केवल उसी के माध्यम से देवता अभिषेक को ग्रहण कर पाएंगे और यज्ञ प्रयोजन भी तभी पूरा होगा जब हवन में स्वाहा शब्द का उच्चारण होगा।

दरअसल कोई भी यज्ञ तब तक सफल नहीं माना जा सकता है जब तक कि हवन का ग्रहण देवता ना कर ले लेकिन कोई भी देवता  ग्रहण तभी कर सकते हैं जबकि अग्नि के द्वारा स्वाहा के माध्यम से अर्पण किया जाए इसलिए हवन में हमेशा स्वाहा शब्द बोला जाता है।

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