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Repo Rate vs Reverse Repo Rate : रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में क्या है अंतर? विस्तार से समझें

Ankit Singh
6 Jan 2022 11:03 AM GMT
Repo Rate vs Reverse Repo Rate : रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में क्या है अंतर? विस्तार से समझें
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Repo Rate & Reverse Repo Rate: अपने रेपो रेट (Repo Rate) और रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate) के बारे में आपने सुना ही होगा, लेकिम क्या आप यह जानते है कि रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट क्या होता है? दोनों के बीच क्या अंतर और समानताएं यह समझने के लिए इस लेख को अंत तक पढें।

Repo Rate vs Reverse Repo Rate: भारतीय अर्थव्यवस्था में रेपो रेट (Repo Rate).और रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate) दो बहुत ही महत्वपूर्ण शब्द हैं। दोनों मुद्रास्फीति (Inflation) को नियंत्रित करने और तरलता को स्थिर करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। Repo और Reverse Repo Rate सुनिश्चित करती हैं कि बाजार में कैश फ्लो में कोई कमी न रहें। RBI ही देश की मौद्रिक नीति (monetary Policy) के अनुसार इन दरों को नियंत्रित और तय करता है।

अब जो लोग इस टर्म से अभी तक अंजान है या वो समझते है कि इसे समझना कठिन है, उन्ही के लिए आज हम इस लेख के माध्यम से यह समझाना चाहते है कि Repo Rate vs Reverse Repo Rate के बीच प्रमुख अंतर क्या है? और इसके दर में कमी या वृद्धि से भरतीय अर्थव्यवस्था क्यों चरमरा जाती है।

रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट क्या हैं? | What are Repo Rate and Reverse Repo Rate?

'रेपो' शब्द का अर्थ 'रीपर्चेसिंग ऑप्शन' है। सरल शब्दों में कहें तो सेंट्रल बैंक (RBI) कमर्शियल बैंकों और वित्तीय संस्थानों को रेपो रेट पर लोन देता है। इसके विपरीत जब सेंट्रल बैंक कमर्शियल बैंकों से उधार लेता है तो वह रिवर्स रेपो रेट पर ब्याज का भुगतान करता है। चलिए Repo Rate और Reverse Repo Rate को विस्तार से उदाहरण के माध्यम से समझाते है।

Repo Rate Kya Hai? | What is Repo Rate in Hindi

Repo Rate को नीतिगत दर के तौर पर जाना जाता है। रेपो रेट वह दर है जिसपर RBI कॉमर्शियल बैंकों या वित्तीय संस्थानों को सरकारी सिक्योरिटीज के बदले तय समय के लिए कर्ज देता है। इसे ऐसे समझिए जैसे कोई शख्स जरूरत पड़ने पर जिस तरह बैंक से लोन लेता है और बदले में ब्याज चुकाता है, ठीक वैसे ही कॉमर्शियल बैंक भी पैसे की किल्लत को पूरा करने के लिए केंद्रीय बैंक यानी RBI से रेपो रेट पर लोन लेते हैं।

जब भी रेपो रेट में कोई बदलाव होता है तो इसका मार्केट में पैसे के फ्लो (प्रवाह) पर असर पड़ता है। जब RBI रेपो रेट कम करता है तो मनी सप्लाई बढ़ने से इकोनॉमी को सपोर्ट मिलता है। लेकिन जब रेपो रेट ज्यादा रहता है तो यह आर्थिक वृद्धि पर निगेटिव असर डालता है।

Reverse Repo Rate kya Hai? | What is Reverse Repo Rate in Hindi

Reverse Repo Rate वह दर है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक, कॉमर्शियल बैंकों के सरप्लस मनी को अपने पास जमा कर लेता है। बदले में RBI इन बैंकों को ब्याज देता है। यही Reverse Repo Rate कहलाता है। जब मार्केट में कैश की उपलब्धता बढ़ जाती है तो महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में RBI Reverse Repo Rate की दर बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज्यादा ब्याज कमाने के लिए RBI के पास अमाउंट जमा करा दे।

रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट के बीच अंतर | Differences Between Repo Rate and Reverse Repo Rate

रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट के बीच मुख्य अंतर ऋणदाता और उधारकर्ता के दृष्टिकोण पर आधारित हैं। यहां कुछ प्रमुख अंतर बताएं गए है।

- रेपो रेट वह ब्याज दर होती है, जिस पर रिजर्व बैंक, कॉमर्शियल बैंकों को लोन देता है। जबकि रिवर्स रेपो रेट वह ब्याज दर होती है, जिस पर रिजर्व बैंक, कॉमर्शियल बैंकों से खुद लोन प्राप्त करने का काम करता है।

- रेपो रेट का उपयोग प्रमुख रूप से, रिजर्व बैंक द्वारा अर्थव्यस्था में बढ रही महंगाई को काबू में करने के लिए होता है। जबकि रिवर्स रेपो रेट का इस्तेमाल प्रमुख रूप से, रिजर्व बैंक द्वारा अर्थव्यवस्था में पैसे की उपलब्धता को नियंत्रण में करने के लिए होता है।

- रेपो रेट बाजार में तरलता को इंजेक्ट करता है जबकि रिवर्स रेपो रेट बाजार से तरलता को अवशोषित करता है।

- रेपो रेट की दर हमेशा रिवर्स रेपो रेट से अधिक ही होती है। जबकि रिवर्स रेपो रेट की दर, रेपो रेट की दर से हमेशा कम रहती है।

रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट के बीच समानताएं | Similarities Between Repo Rate and Reverse Repo Rate

- RBI गवर्नर की अध्यक्षता वाली मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी (MPC) रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट दोनों तय करती है।

- दोनों लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी (LAF) का एक घटक हैं जो एक मॉनेटरी पॉलिसी है, यह बैंकों को पुनर्खरीद समझौतों के माध्यम से उधार लेने की अनुमति देती है।

- दोनों बाजार में तैरते बैंक क्रेडिट की जांच के लिए RBI के उपकरण हैं। जब दर में परिवर्तन होता है, तो बाजार के पैसे की मात्रा बढ़ जाती है या घट जाती है।

- रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट दोनों का उद्देश्य मूल्य स्थिरता है जो वित्तीय प्रणाली की दक्षता में सुधार करता है। यह देश में आर्थिक विकास सुनिश्चित करता है

- दोनों तरलता और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए आरबीआई के शार्ट टर्म टूल की तरह है। दोनों के लिए कार्यकाल 7 दिन या 14 दिन है, क्योंकि अवधि समाप्त होने के बाद पैसे का भुगतान करना पड़ता है।

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